परिचय
दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में भारत और चीन का स्थान-प्रदान है।दोनों देशों ने समय-समय पर जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने या उसे प्रबंधित करने के लिए नीतियां बनाईं। इस ब्लॉग में हम देखेंगे कि चीन ने कैसे नियंत्रित किया अपनी जनसंख्या-वृद्धि, भारत ने क्या कदम उठाए हैं, दोनों में क्या अंतर हैं, और भारत के लिए क्या सबक हैं।
चीन की जनसंख्या नियंत्रण नीति
1. शुरुआत और पृष्ठभूमि
चीन ने 1970-80 के दशक से जनसंख्या नियंत्रण को सबसे गंभीर विषय माना। उदाहरण के लिए, “Later, Longer, Fewer” नीति ने जोड़ों को बाद में शादी करने, बच्चों के बीच अंतर बढ़ाने, और कम बच्चे होने के पक्ष में प्रेरित किया गया।
उसके बाद 1979 में जब One‑Child Policy लागू हुई, तब लगभग प्रत्येक जोड़े को एक ही बच्चा रखने के लिए कहा गया।
2. नियम-विनियम एवं नीतियाँ
- चीन ने 2016 में एक-बच्चे की नीति में छूट देना शुरू किया और बाद में 2021 में तीन-बच्चे की अनुमति दी।
- हालांकि, इन नीतियों के कारण जन्मदर बहुत तेजी से घट गई और देश में बढ़ती आयु-संरचना (ageing population) की समस्या भी उभरी।
- इसके साथ ही, अध्ययन बताते हैं कि चीन में कुछ नीतियों के कारण “मिसिंग गर्ल्स” (लड़कियों की कमी) भी हुई।
3. परिणाम और प्रभाव
- चीन की fertility rate (प्रति महिला औसत बच्चों की संख्या) बहुत कम हो गई है — लगभग 1.2 बच्चों तक।
- जनसंख्या की वृद्ध-मंजिल (इज्जतनुसार वृद्ध लोगों की संख्या) बढ़ी, कामकाजी-आयु वर्ग में कमी आई।
- इसलिए अब चीन को जनसंख्या घटने का सामना करना पड़ रहा है, जबकि पहले वृद्धि थी।jagran.com
भारत की जनसंख्या नियंत्रण नीति
1. पृष्ठभूमि
भारत ने 1952 से ही “परिवार-योजना” कार्यक्रम शुरू किया था, जिससे जन्म-दर गिराने की शुरुआत हुई।
फिर 1976 में पहला राष्ट्रीय जनसंख्या नीति (National Population Policy) आया।
2. उपाय एवं नीतियाँ
- भारत में “परिवार-कल्याण” (family welfare) कार्यक्रमों पर बल दिया गया।
- कई राज्यों में दो-बच्चे की नीति-विचार मंच पर आई, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर पूर्ण रूप से लागू नहीं हुई।
- 2017 में Mission Parivar Vikas नामक कार्यक्रम 146 हाई-फर्टिलिटी जिलों में शुरू हुआ था, जिसे 2025 तक प्रतिस्थापित-स्तर (replacement level) TFR पहुंचाने की दृष्टि से डिजाइन किया गया था।
3. वर्तमान स्थिति
- भारत की fertility rate लगभग 2.0 बच्चों प्रति महिला के आसपास है, जो प्रतिस्थापन-स्तर (≈2.1) के करीब है।
- हालांकि, राज्यों के बीच बड़ी विविधता है — कुछ राज्य अभी भी उच्च जन्म-दर वाले हैं।
- भारत की जनसंख्या नियंत्रण नीतियों में सख्ती की बजाय शिक्षा, सामाजिक विकास, स्वास्थ्य जैसी “गुणवत्ता” पर बल दिया जा रहा है।
तुलना: चीन बनाम भारत
| विषय | चीन की नीति | भारत की नीति |
|---|---|---|
| प्राथमिक उद्देश्य | तेज-तर्रार जनसंख्या वृद्धि को रोकना | जनसंख्या वृद्धि को स्थिर करना, सामाजिक विकास के साथ |
| नियंत्रण का तरीका | निर्देशात्मक, कानूनी और सख्त उदाहरण। जैसे एक-बच्चे की नीति। | प्रेरणा-आधारित, सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से, बड़ी मजबूरी नहीं |
| परिणाम | जनसंख्या वृद्धि रुकी, अब गिरावट-रुझान। बच्चों की संख्या कम, आबादी जल्दी बुढ़ापे की ओर। | जन्म-दर धीरे-धीरे गिर रही है; अभी तक जनसंख्या वृद्धि जारी, लेकिन नियंत्रित होती जा रही |
| चुनौतियाँ | कार्य-शक्ति-आयु वर्ग का सिकुड़ना, लिंग-असंतुलन, सामाजिक असर | राज्यों के बीच असमानता, संसाधनों पर दबाव, दो-बच्चे-नीति जैसी विवादित विचारधाराएँ |
| सीख | सख्त नीति से परिणाम मिल सकते हैं लेकिन प्रतिकूल प्रभाव भी होंगे | विकास-मूलक एवं सामाजिक-उन्मुख दृष्टिकोण बेहतर लेकिन परिणाम आने में समय लगता है |
चीन से भारत के लिए क्या-क्या सीखने योग्य हैं
- सख्ती अकेले काम नहीं करती — चीन ने सख्त नियम लगाए, लेकिन अब उन्हें जनसंख्या गिरावट और वृद्ध-आबादी जैसी समस्या का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए भारत को संतुलित नीति अपनानी चाहिए।
- शिक्षा-और महिलाओं-को सशक्त बनाना — जनसंख्या नियंत्रण सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि गुणवत्ता का मुद्दा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, लड़कियों की स्थिति सुधारना आवश्यक।
- प्रदेश-विशिष्ट नीतियाँ बनाना — भारत में राजस्थान, उत्तर-प्रदेश, बिहार जैसे राज्य में जन्म-दर अभी भी अधिक है। भारत को यूनिफॉर्म नीति की बजाय स्थानीय जरूरतों के अनुसार नीति बनानी होगी।
- लिंग-संतुलन पर ध्यान देना — चीन में लड़कों-लड़कियों में असंतुलन हुआ था। भारत को भी ऐसी चुनौतियों से सचेत होना होगा।
- लंबी अवधि का दृष्टिकोण — कामकाजी-आयु वर्ग की संख्या अगले 10-15 सालों में भारत को लाभ दे सकती है (डेमोग्राफिक डिविडेंड)। इस अवसर को गंवाना नहीं चाहिए।
निष्कर्ष
चीन ने जनसंख्या नियंत्रण में कुछ प्रेरणादायी उदाहरण दिए, लेकिन उन नीतियों के सामाजिक-आर्थिक दुष्प्रभाव भी सामने आए। भारत के लिए आवश्यक है कि वो केवल “दो-बच्चे या एक-बच्चे की नीति” पर नहीं टिके, बल्कि कुल सामाजिक विकास, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच तथा प्रदेशीय विविधता को ध्यान में रखे।
अगर भारत ने समय रहते रणनीति नहीं बनाई, तो जनसंख्या नियंत्रण की चुनौतियाँ (संसाधन-खाना, रोजगार, शिक्षा-स्वास्थ्य) और बढ़ सकती हैं। पर साथ-ही यह अवसर है — यदि अच्छी नीति, स्थिर शासन और सामाजिक भागीदारी हो, तो भारत अपनी जनसंख्या को “बोझ” की बजाय “विकास की शक्ति” बना सकता है।
क्या आप चाहेंगे कि मैं “भारत के लिए अगला दशक: जनसंख्या नीति की रूपरेखा” पर भी एक लेख लिखूं?














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