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“चीन ने कैसे नियंत्रित की जनसंख्या : भारत से तुलना में क्या सीखें?”

population

परिचय

दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में भारत और चीन का स्थान-प्रदान है।दोनों देशों ने समय-समय पर जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने या उसे प्रबंधित करने के लिए नीतियां बनाईं। इस ब्लॉग में हम देखेंगे कि चीन ने कैसे नियंत्रित किया अपनी जनसंख्या-वृद्धि, भारत ने क्या कदम उठाए हैं, दोनों में क्या अंतर हैं, और भारत के लिए क्या सबक हैं।


चीन की जनसंख्या नियंत्रण नीति

1. शुरुआत और पृष्ठभूमि

चीन ने 1970-80 के दशक से जनसंख्या नियंत्रण को सबसे गंभीर विषय माना। उदाहरण के लिए, “Later, Longer, Fewer” नीति ने जोड़ों को बाद में शादी करने, बच्चों के बीच अंतर बढ़ाने, और कम बच्चे होने के पक्ष में प्रेरित किया गया।
उसके बाद 1979 में जब One‑Child Policy लागू हुई, तब लगभग प्रत्येक जोड़े को एक ही बच्चा रखने के लिए कहा गया।

2. नियम-विनियम एवं नीतियाँ

3. परिणाम और प्रभाव


भारत की जनसंख्या नियंत्रण नीति

1. पृष्ठभूमि

भारत ने 1952 से ही “परिवार-योजना” कार्यक्रम शुरू किया था, जिससे जन्म-दर गिराने की शुरुआत हुई।
फिर 1976 में पहला राष्ट्रीय जनसंख्या नीति (National Population Policy) आया।

2. उपाय एवं नीतियाँ

3. वर्तमान स्थिति


तुलना: चीन बनाम भारत

विषयचीन की नीतिभारत की नीति
प्राथमिक उद्देश्यतेज-तर्रार जनसंख्या वृद्धि को रोकनाजनसंख्या वृद्धि को स्थिर करना, सामाजिक विकास के साथ
नियंत्रण का तरीकानिर्देशात्मक, कानूनी और सख्त उदाहरण। जैसे एक-बच्चे की नीति।प्रेरणा-आधारित, सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से, बड़ी मजबूरी नहीं
परिणामजनसंख्या वृद्धि रुकी, अब गिरावट-रुझान। बच्चों की संख्या कम, आबादी जल्दी बुढ़ापे की ओर।जन्म-दर धीरे-धीरे गिर रही है; अभी तक जनसंख्या वृद्धि जारी, लेकिन नियंत्रित होती जा रही
चुनौतियाँकार्य-शक्ति-आयु वर्ग का सिकुड़ना, लिंग-असंतुलन, सामाजिक असरराज्यों के बीच असमानता, संसाधनों पर दबाव, दो-बच्चे-नीति जैसी विवादित विचारधाराएँ
सीखसख्त नीति से परिणाम मिल सकते हैं लेकिन प्रतिकूल प्रभाव भी होंगेविकास-मूलक एवं सामाजिक-उन्मुख दृष्टिकोण बेहतर लेकिन परिणाम आने में समय लगता है

चीन से भारत के लिए क्या-क्या सीखने योग्य हैं

  1. सख्ती अकेले काम नहीं करती — चीन ने सख्त नियम लगाए, लेकिन अब उन्हें जनसंख्या गिरावट और वृद्ध-आबादी जैसी समस्या का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए भारत को संतुलित नीति अपनानी चाहिए।
  2. शिक्षा-और महिलाओं-को सशक्त बनाना — जनसंख्या नियंत्रण सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि गुणवत्ता का मुद्दा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, लड़कियों की स्थिति सुधारना आवश्यक।
  3. प्रदेश-विशिष्ट नीतियाँ बनाना — भारत में राजस्थान, उत्तर-प्रदेश, बिहार जैसे राज्य में जन्म-दर अभी भी अधिक है। भारत को यूनिफॉर्म नीति की बजाय स्थानीय जरूरतों के अनुसार नीति बनानी होगी।
  4. लिंग-संतुलन पर ध्यान देना — चीन में लड़कों-लड़कियों में असंतुलन हुआ था। भारत को भी ऐसी चुनौतियों से सचेत होना होगा।
  5. लंबी अवधि का दृष्टिकोण — कामकाजी-आयु वर्ग की संख्या अगले 10-15 सालों में भारत को लाभ दे सकती है (डेमोग्राफिक डिविडेंड)। इस अवसर को गंवाना नहीं चाहिए।

निष्कर्ष

चीन ने जनसंख्या नियंत्रण में कुछ प्रेरणादायी उदाहरण दिए, लेकिन उन नीतियों के सामाजिक-आर्थिक दुष्प्रभाव भी सामने आए। भारत के लिए आवश्यक है कि वो केवल “दो-बच्चे या एक-बच्चे की नीति” पर नहीं टिके, बल्कि कुल सामाजिक विकासशिक्षामहिला सशक्तिकरणस्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच तथा प्रदेशीय विविधता को ध्यान में रखे।

अगर भारत ने समय रहते रणनीति नहीं बनाई, तो जनसंख्या नियंत्रण की चुनौतियाँ (संसाधन-खाना, रोजगार, शिक्षा-स्वास्थ्य) और बढ़ सकती हैं। पर साथ-ही यह अवसर है — यदि अच्छी नीति, स्थिर शासन और सामाजिक भागीदारी हो, तो भारत अपनी जनसंख्या को “बोझ” की बजाय “विकास की शक्ति” बना सकता है।

क्या आप चाहेंगे कि मैं “भारत के लिए अगला दशक: जनसंख्या नीति की रूपरेखा” पर भी एक लेख लिखूं?

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